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तुम मिल गए तो मुझ से नाराज है खुदा, कहता है कि तू अब कुछ माँगता नहीं है।
जुड़ गई रूह तुझसे हो गई मुकम्मल मोहब्बत मेरी
रात होती है हर शाम के बाद, तेरी याद आती है हर बात के बाद, हमने खामोश रहकर भी देखा है तेरी आवाज आती है मेरी हर सांस के बाद।
रात गुमसूँ है मगर चेन खामोश नही कैसे कह दू आज फिर होश नही, ऐसा डूबा तेरी आखो की गहराई मैं, हाथ में जाम है मगर पीने का होश नही
मेरे दिल ने जब भी दुआ माँगी है, तुझे माँगा है तेरी वफ़ा माँगी है, जिस मोहब्बत को देख के दुनिया को रश्क आये, तेरे प्यार करने की वो अदा माँगी है।
तेरे हुश्न पे कुर्बान हो जाऊ तेरी बाहों में बेजान हो जाऊ ऐसी नज़ाक़त है तेरी सूरत की की मै तेरा गुलाम हो जाऊ
तुम हशीन हो के गुलाब जैसी हो, बहुत नाजुक हो ख्वाब जैसी हो, होठों से लगाकर पी जाऊं तुम्हे, सर से पाँव तक शराब जैसी हो।
ना महीनों की गिनती, ना सालों का हिसाब है.. मोहब्बत आज भी तुमसे बेइंतहां… बेहिसाब है.!
गुलाब जैसी हो, गुलाब लगती हो, हल्का सा भी मुस्कुरा दो तो, लाज़वाब लगती हो…
हर बार दिल से ये पैगाम आए; ज़ुबाँ खोलूं तो तेरा ही नाम आए; तुम ही क्यूँ भाए दिल को क्या मालूम; जब नज़रों के सामने हसीन तमाम आए.
कुछ सोचूं तो तेरा ख्याल आ जाता है; कुछ बोलूं तो तेरा नाम आ जाता है; कब तलक बयाँ करूँ दिल की बात; हर सांस में अब तेरा एहसास आ जाता है।
चेहरे पे मेरे जुल्फों को फैलाओ किसी दिन क्यूँ रोज गरजते हो बरस जाओ किसी दिन खुशबु की तरह गुजरो मेरी दिल की गली से फूलों की तरह मुझपे बिखर जाओ किसी दिन।
मंजिल भी तुम हो तलाश भी तुम हो उम्मीद भी तुम हो आस भी तुम हो इश्क भी तुम हो और जूनूँ भी तुम ही हो अहसास तुम हो प्यास भी तुम ही हो।
तेरे सीने से लगकर तेरी आरजू बन जाऊँ तेरी साँसो से मिलकर तेरी खुश्बू बन जाऊँ फासले ना रहें कोई तेरे मेरे दरमिआँ मैं…मैं ना रहूँ बस तू ही तू बन जाऊँ।
तेरा इश्क़ भी महंगाई की तरह है, दिनों दिन बढ़ता जा रहा है।
न होके भी तू मौजूद है मुझमें क्या खूब तेरा वजूद है मुझमें
तेरे इंतज़ार में मेरा बिखरना इश्क़ है, तेरी मुलाकात पे मेरा निखरना इश्क़ है।
हक़ीक़त ना सही तुम ख़्वाब की तरह मिला करो, भटके हुए मुसाफिर को चांदनी रात की तरह मिला करो।
गर मेरी चाहतों के मुताबिक ज़माने की हर बात होती तो बस मैं होता तुम होती और सारी रात बरसात होती।
मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब का जगा हुआ ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ।
छू गया जब कभी ख्याल तेरा दिल मेरा देर तक धड़कता रहा कल तेरा ज़िक्र छिड़ गया घर में और घर देर तक महकता रहा।
कभी लफ्ज़ भूल जाऊं कभी बात भूल जाऊं तूझे इस कदर चाहूँ कि अपनी ज़ात भूल जाऊं कभी उठ के तेरे पास से जो मैं चल दूँ जाते हुए खुद को तेरे पास भूल जाऊं।
कुछ खास नही… इन हाथों की लकीरों में मगर तुम हो तो… एक लकीर ही काफी है.
ये दिल ही तो जानता है मेरी पाक मोहब्बत का आलम, की मुझे जीने के लिए सांसों की नही तेरी ज़रुरत है!!